होली भारत के सबसे प्रमुख और आनंदमय त्योहारों में से एक है। साल 2026 की होली इस बार खास चर्चा में है क्योंकि इस दिन एक दुर्लभ खगोलीय और धार्मिक संयोग बन रहा है। लगभग 122 वर्षों बाद ऐसा अवसर आ रहा है जब होली के आसपास चंद्रग्रहण का योग बन रहा है। इसी कारण होलिका दहन की सही तिथि और समय को लेकर ज्योतिषियों और पंचांगों में अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं।
धार्मिक मान्यताओं, ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति और ग्रहण के समय को ध्यान में रखते हुए कई विद्वान अलग-अलग तिथियों पर होलिका दहन करने की सलाह दे रहे हैं। ऐसे में आम लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर होलिका दहन कब करना शुभ रहेगा और होली कब मनाई जाएगी।

122 साल बाद बन रहा दुर्लभ खगोलीय योग
ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार वर्ष 2026 में होली के आसपास चंद्रग्रहण का प्रभाव देखने को मिलेगा। खगोलविदों और ज्योतिष विशेषज्ञों का मानना है कि लगभग 122 वर्षों बाद ऐसा विशेष संयोग बन रहा है। इससे पहले साल 1904 में होली के समय इसी प्रकार का ग्रहण योग बना था।
धार्मिक दृष्टि से ग्रहण का समय पूजा और शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। इसलिए जब किसी बड़े पर्व के साथ ग्रहण का संयोग बनता है, तो उस पर्व की तिथि और मुहूर्त को लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। इस बार भी होलिका दहन को लेकर यही स्थिति बनी हुई है।
होलिका दहन की तिथि को लेकर क्यों है मतभेद
कुछ पंचांगों और ज्योतिषियों के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा 2 मार्च 2026 को पड़ रही है और उसी दिन शाम के समय होलिका दहन किया जा सकता है। वहीं कुछ विद्वानों का मत है कि उस दिन चंद्रग्रहण का प्रभाव होने के कारण शुभ मुहूर्त प्रभावित होगा।
दूसरे पक्ष के अनुसार ग्रहण के प्रभाव से बचने के लिए होलिका दहन 3 मार्च को करना अधिक उचित माना जा रहा है। उनका तर्क है कि ग्रहण समाप्त होने के बाद ही पूजा और दहन करना शास्त्रों के अनुसार अधिक शुभ रहेगा।
इसी कारण देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग पंचांगों के अनुसार तिथि तय की जा रही है।
ग्रहण का समय और धार्मिक मान्यता
ज्योतिष गणनाओं के अनुसार 2 मार्च की शाम से चंद्रग्रहण का प्रभाव शुरू होने की संभावना बताई जा रही है। ग्रहण का सूतक काल आमतौर पर ग्रहण से लगभग 9 घंटे पहले शुरू माना जाता है।
सूतक काल में पूजा-पाठ, शुभ कार्य और धार्मिक अनुष्ठान करना वर्जित माना जाता है। इसलिए कई विद्वानों का मानना है कि ग्रहण के कारण उसी दिन होलिका दहन करना उचित नहीं होगा।
हालांकि कुछ ज्योतिषियों का कहना है कि भारत में ग्रहण का प्रभाव आंशिक होने या कुछ क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई न देने की स्थिति में होलिका दहन पर इसका असर कम माना जा सकता है।
होलिका दहन का धार्मिक महत्व
होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद को मारने के लिए उसकी बुआ होलिका ने अग्नि में बैठकर उसे जलाने की कोशिश की थी। लेकिन भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका जलकर भस्म हो गई।
इसी घटना की याद में फाल्गुन पूर्णिमा की रात को होलिका दहन किया जाता है। लोग अग्नि की परिक्रमा करते हैं, नई फसल की बालियां भूनते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
होली का पर्व कब मनाया जाएगा
अधिकांश पंचांगों के अनुसार रंगों का त्योहार धुलंडी या रंग वाली होली 4 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। होलिका दहन के अगले दिन ही रंगों की होली खेली जाती है।
इस दिन लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर खुशियां बांटते हैं, मिठाइयां खिलाते हैं और सामाजिक मेल-मिलाप का आनंद लेते हैं। यह पर्व भाईचारे और प्रेम का संदेश भी देता है।
सही तिथि की पुष्टि कैसे करें
ऐसी स्थिति में सबसे अच्छा तरीका यह है कि लोग अपने स्थानीय मंदिर, पंडित या क्षेत्रीय पंचांग के अनुसार होलिका दहन का समय तय करें। अलग-अलग क्षेत्रों में पंचांग की गणना में थोड़ा अंतर हो सकता है।
विश्वसनीय जानकारी के लिए लोग भारतीय पंचांग, खगोल विज्ञान से जुड़ी वेबसाइटों या सरकारी खगोलीय संस्थानों जैसे भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA) या ISRO से संबंधित प्रकाशनों का भी संदर्भ ले सकते हैं।
